भारत में चीन से 3 गुना ज्यादा स्कूलें, पर गुणवत्ता में पीछे

शिक्षा का अधिकार, RTE (Right to education or The right of children to free and compulsory education act) अधिनियम के पारित होने के बाद के दशक में 100% नामांकन का लक्ष्य प्राथमिक विद्यालयों में काफी हद तक हुआ परंतु सीखने में गुणात्मक सुधार की समस्या बनी हुई है।

नामांकन पर जोर देने के कारण भारत ने हर बस्ती के पास स्कूल के निर्माण की रणनीति अपनाई, जिस कारण छोटी आबादी और अपर्याप्त संसाधनों वाले स्कूलों का प्रसार हुआ। लेकिन खराब व्यवस्था और सरकारी लचर रवैए के कारण इसकी स्थिति खराब होती गई।

आज यहां चीन से तुलनात्मक 3-4 गुना ज्यादा स्कूल है। लगभग डेढ़ करोड़ भारतीय छात्र ऐसे गैर-जिम्मेदार स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां शिक्षकों की गुणवत्ता और संख्या दोनों कम है।

इस समस्या के क्या कारण है? इसके क्या समाधान हो सकते हैं? आइए इसपर विचार करें।

  1. शिक्षकों की कमी
    देश में आज लगभग 10 लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। रिपोर्ट में कहा गया, मध्यप्रदेश, ओडिशा और राजस्थान समान रूप से प्रभावित है। झारखंड जैसे राज्यों में 40% शिक्षकों की कमी है। जबकि प्राइवेट संस्थानों में शिक्षक ढूंढना एक सामान्य और आसान प्रक्रिया होती है।
  2. शिक्षकों को अतिरिक्त काम का बोझ
    शिक्षक के उनके मूल काम के अलावे उन्हें अतिरिक्त कामों का बोझ दिया जाता है। उन्हें शैक्षिक कार्यों के अलावा भोजन का प्रबंधन, अन्य कई सरकारी सर्वेक्षण, प्रशासनिक कार्य, सरकारी रैली और चुनावी कर्तव्यों में भी संलग्न किया जाता है। इसी कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति एक स्वभाविक प्रक्रिया है। समस्या वेतन नहीं है। एक मध्यम प्राइवेट स्कूल के शिक्षकों का वेतन सरकारी स्कूल से कई गुना कम होता है फिर भी वे इनसे बेहतर होते हैं। क्योंकि उनके मैनेजमेंट में पूरी पारदर्शिता होती है।
  3. अयोग्य शिक्षकों की बहाली
    दरअसल कई भारतीय आवेदक नौकरी पाने के लिए स्कूल बोर्ड को रिश्वत देते हैं। भारत में 17,000 शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान निम्न श्रेणी की डिग्री की दुकान है। उन्हें यह सिखाया जाता है कि कक्षा का प्रबंधन कैसे करना है। परंतु अन्य बेहतर शिक्षक से सीखना उनके लिए एक कठिन काम है। कक्षा 5 के लगभग बच्चे कक्षा 2 का पाठ ढंग से नहीं पढ़ पाते हैं। इसी कारण स्कूली शिक्षा व्यवस्था समाप्त होने के बाद उनमें पढ़ाई छोड़ने की दर बढ़ जाती है ऐसा सिर्फ छात्रों ही नहीं शिक्षक स्वयं विषय ज्ञान और पढ़ाने की क्षमता से संघर्ष करते हैं।
  4. पढ़ाई के अलावा अन्य कौशल पर कम ध्यान देना
    देश में 100 में से 80 स्कूल ऐसे हैं जहां कंप्यूटर, खेलकूद, संगीत आदि जैसे कार्यक्रम न के बराबर होते हैं। इन्हें साल में बस एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है। बच्चों में एक ही कौशल (सिर्फ पढाई) की विवशता के कारण इनमें हो सकने वाले अन्य कौशल भी दब जाते हैं।
  5. शिक्षा निदेशालय और स्कूलों के बीच संचार तंत्र का कमजोर होना
    शिक्षा निदेशालय और स्कूलों के बीच संचार चैनल पूरी तरह से टूट गए हैं स्कूलों में उत्पन्न की जा रही सीखने और वापस लिए जाने के बारे में बहुत कम आंकड़े हैं। इसलिए शिक्षा कार्यक्रमों में सुधार बेहद जरूरी है। RTE के तहत प्रत्येक गांव में 1 किलोमीटर के भीतर एक प्राथमिक विद्यालय होना चाहिए परंतु इसका कोई मापदंड नहीं है कि गुणवत्ता कैसी होनी चाहिए? मैनेजमेंट कैसा है?

Image credit: Times of India

अच्छी खबर

देश में कुछ ऐसे लो-कोस्ट प्राइवेट स्कूल है, जहाँ शिक्षकों का वेतन सरकारी शिक्षकों से 3 गुना कम होता है फिर भी वे बेहतर रिजल्ट देते हैं।

इस तरह के परिणामों से उत्साहित होकर कुछ सुधारक निजी स्कूलों के विस्तार और सुधार की कोशिश के लिए“पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप” की नीति अपना रहे हैं, जो बेहतर है। जहाँ स्कूल निजी संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं लेकिन सरकार द्वारा वित्त पोषित होते हैं।

लोग शिक्षा को तकनीकी रूप से समृद्ध होने की बात करते हैं जो काफी महत्वपूर्ण है। Ekstep, Teach For India जैसे कई संस्थान शिक्षा सुधार के लिए वृहद रुप से काम कर रही है। परन्तु ये कहना मुश्किल है कि आने वाले वक्त में ये गरीबों के लिए सुलभ रहेगी या नहीं?

इसलिए भारतीय नीति निर्माताओं को इस व्यापक महत्वकांक्षी तकनीकी सुधारों में बदवाल का हिस्सा बनना होगा। हालांकि मौजूदा सरकार ने सार्वजनिक और निजी दोनों स्कूलों में परिणामों के लिए जवाबदेही बनने का वादा किया है।

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    7 thoughts on “भारत में चीन से 3 गुना ज्यादा स्कूलें, पर गुणवत्ता में पीछे”

    1. कुमार तुम्हारे लेख का विषय और जानकारियाँ अतिउत्तम है.
      UNESCO और Class concern के images सटीक हैं. लगता है काफ़ी मेहनत और research करके लिखा गया पोस्ट है.

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    2. जब योजना या पर्यवेक्षण के बिना चीजें जल्दबाजी में की जाती हैं, तो परिणाम नकारात्मक होते हैं। ये लोकलुभावनता के पहलू हैं। सरकार से स्कूलों के निर्माण को नियंत्रित करने की उम्मीद की जाती है। कम अध्ययन केंद्र लेकिन अच्छी गुणवत्ता के। बहुत अच्छी जानकारी और अच्छी व्याख्या। ऐसा लगता है कि आपने एक उत्कृष्ट जांच की। एक अच्छी पोस्ट

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      1. धन्यवाद सर! मुझे जानकर खुशी हुई कि आप हिंदी भी जानते हैं। वैसे आप इतने भाषाओं में उत्कृष्ट कैसे है? अन्य भाषा को सीखने का सरल तरीका क्या हो सकता है?

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        1. वास्तव में, मैं केवल google tarductor का उपयोग करता हूं। उदाहरण के लिए, मैंने स्पेनिश में एक वाक्य डाला और उसका हिंदी में अनुवाद किया। फिर मैं हिंदी से स्पेनिश में गया और सत्यापित किया कि जो मैं कहना चाहता हूं वह सही है। और इसलिए, स्पेनिश में, मैं ऐसे शब्दों की तलाश कर रहा हूं जो हिंदी में बहुत अच्छे हैं। मैं केवल स्पैनिश बोलता हूं और मैं अनुवादक के साथ अपना बचाव करता हूं। मुझे नहीं पता कि मैं समझा रहा हूं या नहीं।

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        2. ओह! ऐसी बात है। google वाकई में हम लोगों के लिए शानदार काम कर रहा है। मैं भी अंग्रेजी के वाक्यों को समझने के लिए इसका सहारा लेता हूँ। 😊

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      2. पर यहाँ तो योजना को फलीभूत होने में ही बहुत वक़्त लग जाता है।

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